नगर निगम और एनजीओ की मिलीभगत का है यह कमाल

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गुरुग्राम (मदन लाहौरिया) 27 दिसंबर। यह खबर पढ़ के बड़ा ताज्जुब होगा कि कूड़े कर्कट को अलग-अलग करने के प्रचार प्रसार करने में सैंकड़ों करोड़ रूपये पानी में बहाने के पीछे का खेल कुछ तथाकथित एनजीओ व नगर निगम गुरुग्राम के कुछ भ्रष्टाचारी अफसरों की मिलीभगत से हुआ है! बड़ी हैरानी की बात है कि पिछले दो वर्षों में जब बंधवाड़ी प्लांट पर कूड़ा कर्कट को अलग अलग करने की मशीनें एक गहरी साजिश के तहत नहीं लगाई गई तो फिर नगर निगम के अधिकारीयों ने कुछ एनजीओ की दुकानदारी चलाने के लिए कूड़े कर्कट को अलग अलग करने का प्रचार चलाया और उन तथाकथित एनजीओ को प्रचार के माध्यम से गुप्त रूप से निगम से अनेकों लाभ लेने के लिए जोड़ा गया! जिस ईको ग्रीन कंपनी को कूड़ा उठाने की व्यवस्था व कूड़े से बिजली बनाने का काम दिया हुआ था उसी ईको ग्रीन कंपनी को कूड़ा अलग अलग करने के लिए तुरंत ट्रोमल मशीनें लगानी थी परंतु इसी गहरी साजिश के तहत ईको ग्रीन कंपनी के द्वारा पिछले दो वर्षों में कूड़े को अलग करने वाली मशीनें नहीं लगाई गई और अब बहुत ज्यादा हायतौबा होने के बाद मात्र दो मशीनें कूड़े को अलग करने के लिए लगाई जब कि कम से कम आठ मशीनें लगाई जानी थी! दो वर्षों से कूड़े को अलग-अलग ना करने की वजह से बंधवाड़ी प्लांट पर आज लगभग 35 लाख टन कूड़ा हर प्रकार का मिक्स पड़ा हुआ है जिसे पहले मशीनों के द्वारा अलग अलग किया जाना है!

गुरुग्राम शहर के हर इलाकों से जितने भी कूड़ा इकठ्ठा करने वाले कर्मचारी हैं वे सभी कूड़े को मिक्स तरीके से ही कूड़े के वाहनों में लादकर ले जाते हैं और कूड़े के डंपिंग स्थान पर मिक्स तरीके से ही कूड़े को ले जाकर डाल देते हैं तथा उन डंपिंग स्थानों से मिक्स कूड़ा ही ईको कंपनी के द्वारा अपने डंपरों व कूड़े की गाडिय़ों में लाद कर मिक्स कूड़े की शक्ल में बंधवाड़ी प्लांट पर पिछले दो वर्षों से ले जाया जा रहा है! कूड़े को मिक्स रूप से उठाने व मिक्स रूप से ले जाने की यह प्रक्रिया पिछले दो वर्षों से जब निरंतर चल रही हो तो फिर कूड़े कर्कट को अलग-अलग तीन रंगों के डस्टबिनों में डालने का प्रचार प्रसार व सम्मेलन या विचार गोष्ठियां सरकारी खर्चों पर कुछ एनजीओ को लाभ पहुँचाने के लिए किया जा रहा हो तो यह सीधा सीधा सरकारी फंड का दुरूपयोग व जनता को उल्लु बनाने का गंभीर मसला बनता है!

यहां पर एक बात और भी विचारणीय बनती है कि गुरुग्राम जैसे बड़ी आबादी के शहर में जहां एक हजार टन के लगभग कूड़ा रोजाना निकलता हो वहां पर कूड़े को निचले स्तर पर यानि कि घरों व गली मौहल्लों से गीला व सूखा अलग-अलग कैसे उठाया जा सकता है यह संभव होना नजर नहीं आता और व्यवहारिक तौर पर भी कारगार नहीं हो सकता! कुछ एनजीओ अपनी स्वार्थ सिद्धि व अपनी दुकानदारी चलाने के लिए नमूने के तौर पर यदि किसी किसी रिहायशी इलाके में अलग अलग डस्टबिन लगवा कर व कूड़े उठाने वाली छोटी रेहड़ी में अलग अलग बड़े डस्टबिन भी रखवा कर कूड़े की व्यवस्था करते हैं तो आखिर में तो कूड़े की गाडिय़ों में तो इकठ्ठा होकर ही जाना है ! नगर निगम व कुछ एनजीओ के द्वारा जो कूड़े कर्कट को अलग-अलग करके डालने की कहानी चल रही है वो सरासर बेकार की कसरत है! इस सारी कसरत की बजाय तो बंधवाड़ी प्लांट पर ईको ग्रीन कंपनी के द्वारा कम से कम 15 से 20 मशीनें कूड़े को अलग-अलग करने की लगाई जानी चाहिए ताकि जो 35 लाख टन कूड़ा पड़ा हुआ है वो जल्द से जल्द अलग-अलग करके बिजली बनाने के काम आ सके।

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