नई पद्धतियों से भारत में कैंसर के इलाज में हुआ है क्रांतिकारी बदलाव

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फरीदाबाद : इलाज की नई पद्धतियों यानी थेरेपी से ना केवल कैंसर का इलाज आसान व तेज हुआ है, बल्कि शरीर पर न्यूनतम दुष्प्रभाव के साथ इलाज के बाद मरीज के जीवन स्तर में भी सुधार आया है। नर्सिंग होम एसोसिएशन (एनएचए), फरीदाबाद द्वारा आयोजित चिकित्सकों के कॉन्क्लेव में दक्षिणी दिल्ली के नीति बाग स्थित राजीव गांधी कैंसर इंस्टीट्यूट एंड रिसर्च सेंटर (आरजीसीआईआरसी) के मेडिकल ओंकोलॉजी कंसल्टेंट डॉ. मनीष शर्मा ने विभिन्न प्रकार के कैंसर के इलाज के नए तरीकों के बारे में जानकारी साझा की। कार्यक्रम की अध्यक्षता एनएचए फरीदाबाद की सचिव डॉ. अनीता गर्ग और प्रेसिडेंट डॉ. नरेश जिंदल ने की।

डॉ. मनीष शर्मा ने कहा कि कैंसर के इलाज में तीन अहम क्षेत्र हैं – रेडिएशन, सर्जरी और दवा। पिछले कुछ दशक में इन तीनों क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति देखने को मिली है।

आज भारत में प्रोटॉन थेरेपी, स्टीरियोटैक्टिक बॉडी रेडिएशन थेरेपी (एसबीआरटी), ट्रू बीम, रैपिड आर्क और 3-डी कंफर्मल रेडिएशन थेरेपी समेत रेडिएशन थेरेपी के क्षेत्र में हुए सभी बदलाव उपलब्ध हैं। टारगेटेड रेडिएशन पद्धतियां अंगों की हिफाजत और इलाज के बाद जीवन की गुणवत्ता बेहतर करने में अहम भूमिका निभा रही हैं। पुरानी तकनीकों में अंगों को रेडिएशन के कारण जलना पड़ता था, लेकिन अब आईएमआरटी, आईजीआरटी और एसबीआरटी जैसी तकनीकों की मदद से शरीर में आसपास के हिस्सों को प्रभावित किए बिना सीधे कैंसर के ट्यूमर को निशाना बनाना संभव होता है।

सर्जरी में रोबोटिक सर्जरी और की-होल सर्जरी की भूमिका भी बढ़ी है। इसका लक्ष्य है कि कैंसर का इलाज सटीक हो और अंगों की हिफाजत की जा सके। पारंपरिक सर्जरी की तुलना में रोबोटिक सर्जरी के कई फायदे हैं, क्योंकि इसमें बहुत छोटा चीरा लगाना पड़ता है, इससे कम खून निकलता है, कम दर्द होता है, जल्दी घाव भरता है, मरीज को अस्पताल में कम रहना पड़ता है और ऑपरेशन के बाद मरीज को दर्द निवारक दवाएं यानी पेनकिलर भी कम देनी पड़ती है।

मेडिकल ओंकोलॉजी में पारंपरिक कीमोथेरेपी की जगह तेजी से इम्यूनोथेरेपी, टारगेटेड थेरेपी और सेल्युलर थेरेपी ले रही हैं। अब बहुत से कैंसर का इलाज केवल खाई जा सकने वाली दवाओं से ही संभव हो गया है। अब हमारे पास ऐसी दवाएं जो शरीर की इम्यूनिटी को बढ़ाती हैं और शरीर खुद कैंसर कोशिकाओं को मारने में सक्षम हो जाता है, जिससे कैंसर का इलाज और भी आसान हुआ है।

नए बदलावों पर डॉ. शर्मा ने कहा, ‘आज की तारीख में पहले की तुलना में हम मॉलीक्युलर बायोलॉजी को ज्यादा बेहतर तरीके से समझते हैं, क्योंकि हम मनुष्य की जीनोम मैपिंग करने में सक्षम हुए हैं। इससे हर मरीज के हिसाब से कैंसर का अलग इलाज दे पाना संभव हुआ है। उदाहरण के तौर पर फेफड़े के कैंसर के दो मरीजों को उनकी जेनेटिक खूबी के आधार पर अलग-अलग इलाज दिया जाता है। इसलिए आज कैंसर के इलाज में पर्सनलाइज्ड थेरेपी यानी मरीज के हिसाब से इलाज की भूमिका भी तेजी से बढ़ रही है।’

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